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हिमालय का महाकुम्भ: नंदा देवी राज जात

Kamal Kishore Kandpal

हिमालय का महाकुम्भ: नंदा देवी राज जात

नन्दादेवी राजजात उत्तराखंड की ऐतिहासिक और पारंपरिक धार्मिक यात्रा है.यह विश्व की सबसे लम्बी पैदल 280 किलोमीटर लम्बी यात्रा है. यह उत्तराखंड के कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। यह लगभग १२ वर्षों के बाद आयोजित होती है। अन्तिम जात सन् 2012 में हुयी थी। अगली राजजात सन् 2023 में होगी . हर 12 साल में होने वाली माँ नंदा देवी की इस यात्रा को हिमालय का कुम्भ भी कहते हैं.

जात का अर्थ होता है देवयात्रा अतः नन्दा राजजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। यह यात्रा इष्ट देव भूमि में मानव और देवताओं के संबंधों की अनूटी दास्तान है। यह यात्रा पहाड़ के कठोर जीवन का आयना है। तो पहाड़ी में ध्याणी (विवाहित बेटी-बहन) के संघर्षों की कहानी भी है।

source:कमल किशोर कांडपाल

आठवीं सदी से हुई शुरुआत

राजजात की शुरूवात आठवीं सदी के आसपास हुई बताई जाती है। यह वह काल था जब आदि गुरू शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना की थी। रूपकुण्ड के नरकंकाल, बगुवावासा में स्थित आठवीं सदी की सिद्ध विनायक भगवान गणेश की काले पत्थर की मूर्ति आदि इस यात्रा की ऐतिहासिकता को सिद्ध करते हैं, साथ ही गढ़वाल के परंपरागत नन्दा जागरी (नन्दादेवी की गाथा गाने वाले) भी इस यात्रा की कहानी को बयॉं करते हैं।


source:कमल किशोर कांडपाल

गढ़वाल रियासत की इष्ट देवी है माँ नंदा

लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रुप में देखा जाता है परन्तु कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रुप माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। पूरे उत्तराखंड में समान रुप से पूजे जाने के कारण नन्दादेवी के समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रुप में देखा गया है।

नौटी गाँव से शुरू होता है माँ नंदा का सफ़र मान्यता के अनुसार देवी की यह ऐतिहासिक यात्रा चमोली के नौटीगाँव से शुरू होती है और कुरूड़ के मन्दिर से भी दशोली और बधॉण की डोलियॉं राजजात के लिए निकलती हैं। इस यात्रा में लगभग 280 किलोमीटर की दूरी, नौटी से होमकुण्ड तक पैदल करनी पड़ती है। इस दौरान घने जंगलों पथरीले मार्गों, दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है।

अलग-अलग रास्तों से ये डोलियॉं यात्रा में मिलती है। इसके अलावा गाँव-गाँव से डोलियॉं और छतौलियॉं भी इस यात्रा में शामिल होती है। कुमाऊँ (कुमॉयू) से भी अल्मोडा, कटारमल और नैनीताल से डोलियॉं नन्दकेशरी में आकर राजजात में शामिल होती है।

नौटी से शुरू हुई इस यात्रा का दूसरा पड़ाव इड़ा-बधाणीं है। फिर यात्रा लौठकर नौटी आती है। इसके बाद कासुंवा, सेम, कोटी, भगौती, कुलसारी, चैपडों, लोहाजंग, वाँण, बेदनी, पातर नचौणियाँ से विश्व-विख्यात रूपकुण्ड, शिला-समुद्र, होमकुण्ड से चनण्यॉंघट (चंदिन्याघाट), सुतोल से घाट होते हुए नन्दप्रयाग और फिर नौटी आकर यात्रा का चक्र पूरा होता है। यह दूरी करीब 280 किमी. है।

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source:कमल किशोर कांडपाल

चौसिंग्या खाडू़: माँ नंदा का दूत

राजजात में चौसिंग्या खाडू़ (चार सींगों वाला भेड़) भी शामिल किया जाता है जोकि स्थानीय क्षेत्र में राजजात का समय आने के पूर्व ही पैदा हो जाता है, उसकी पीठ पर रखे गये दोतरफा थैले में श्रद्धालु गहने, श्रंगार-सामग्री व अन्य हल्की भैंट देवी के लिए रखते हैं, जोकि होमकुण्ड में पूजा होने के बाद आगे हिमालय की ओर प्रस्थान कर लेता है। लोगों की मान्यता है कि चौसिंग्या खाडू़ आगे बिकट हिमालय में जाकर लुप्त हो जाता है व नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है। वर्ष 2000 में इस राजजात को व्यापक प्रचार मिला और देश-विदेश के हजारों लोग इसमें शामिल हुए थे।

नंदा राज जात समिति का होता है यात्रा का जिम्मा

स्थानीय लोगों ने इस यात्रा के सफल संचालन हेतु श्री नन्दादेवी राजजात समिति का गठन भी किया है। इसी समिति के तत्त्वाधान में नन्दादेवी राजजात का आयोजन किया जाता है। परम्परा के अनुसार वसन्त पंचमी के दिन यात्रा के आयोजन की घोषणा की जाती है। इसके पश्चात इसकी तैयारियों का सिलसिला आरम्भ होता है। इसमें नौटी के नौटियाल एवं कासुवा के कुवरों के अलावा अन्य सम्बन्धित पक्षों जैसे बधाण के १४ सयाने, चान्दपुर के १२ थोकी ब्राह्मण तथा अन्य पुजारियों के साथ-साथ जिला प्रशासन तथा केन्द्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा मिलकर कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार कर यात्रा का निर्धारण किया जाता है।

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क्या है लोकमान्यता

मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में भगवान आशुतोष एवं मां पार्वती इस स्थान से कैलाश जा रहे थे। इसी दौरान मां पार्वती को प्यास लगी और वे समीपवर्ती गांव बधाणी जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे शैलेश्वर की ओर निकल गए। बधाणी गांव में उस समय के थोकदार एवं पधान जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) ने उन्हें पानी पिलाने के साथ खूब आदर सत्कार करते हुए दही-भात भी खिलाया। विदा होते समय जमन सिंह जदोड़ा ने देवी मां से कहा कि कैलाश जाते समय वे जरुर उसके घर पर आए। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व ईड़ा-बधाणी में जदोड़ा वंशज गुंसाई लोगों के घर रात्रि विश्राम करती है। इस विषय में कई किवदंतियां भी प्रचलित हैं।कहते हैं कि राजजात तब होती है जब देवी का दोष (प्रकोप) लगने के लक्षण दिखाई देते हैं। ध्याणी (विवाहित बेटी-बहन) भूमिया देवी ऊफराई की पूजा करती है इसे मौड़वी कहा जाता है। ध्याणीयां यात्रा निकालती है, जिसे डोल जातरा कहा जाता है। कासुंआ के कुंवर (राज वंशज) नौटी गाँव जाकर राजजात की मनौती करते हैं। कुंवर रिंगाल की छतोली (छतरी) और चौसिंग्या खाडू़ (चार सींगों वाला भेड़) लेकर आते हैं। चौसिंगा खाडू का जन्म लेना राजजात की एक खास बात है। नौटियाल और कुँवर लोग नन्दा के उपहार को चौसिंगा खाडू की पीठ पर होमकुण्ड तक ले जाते हैं। वहाँ से खाडू अकेला ही आगे बढ़ जाता है। खाडू के जन्म साथ ही विचित्र चमत्कारिक घटनाये शुरु हो जाती है। जिस गौशाला में यह जन्म लेता है उसी दिन से वहाँ शेर आना प्रारम्भ कर देता है

हिमालयन फिल्म्स द्वारा बनाई गयी इस डाक्यूमेंट्री का बेतरीन निर्देशन किया गया है आप भी एक बार वीडियो जरूर देखे

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