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हिमालय का महाकुम्भ: नंदा देवी राज जात

Kamal Kishore Kandpal

हिमालय का महाकुम्भ: नंदा देवी राज जात नन्दादेवी राजजात उत्तराखंड की ऐतिहासिक और पारंपरिक धार्मिक यात्रा है.यह विश्व की सबसे लम्बी पैदल 280 किलोमीटर लम्बी यात्रा है. यह उत्तराखंड के कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। यह लगभग १२ वर्षों के बाद आयोजित होती है। अन्तिम जात सन्

रम्माण उत्तराखंड की सांस्कृतिक विश्वधरोहर

रम्माण उत्सव उत्तराखंड के चमोली जनपद के सलूड़-डुंग्रा गांव में प्रति वर्ष अप्रैल माह में ‘रम्माण’ उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव को 2009 में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया है।रम्माण का आधार रामायण की मूलकथा है और उत्तराखण्ड की प्रचीन मुखौटा परम्पराओं के साथ जुड़कर रामायण ने

उत्तरायणी कौतिक का गौरवमय इतिहास

उतरैणी कौतिक' इस शब्द में उतरैणी का अर्थ है कि सूर्य देेव का उत्तर दिशा की ओर बढ़ना है और कौतिक का अर्थ है मेंला, हर वर्ष सूर्य देव छः माह उत्तरायण में रहते है और छः माह दक्षरायण में, मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करते है इस

Maun Fair Of Uttarakhand

जौनसार बावर का लोकप्रिय और परम्परागत त्योहार मौण मेला मछली मारने का यह उत्सव विशेष रूप से जौनसार और रवांई जौनसार के क्षेत्रों में मनाया जाता है। इसको मनाये जाने की तिथि प्राय: जून जून महीने में 27 या 28 तारीख को पडती है। मौण का अर्थ है तिमूर के छिलकों

Kandali Festivals Of Uttarakhand

कंडाली महोत्सव पिथौरागढ़ जिले के चौदास घाटी में हर बारह वर्ष के उपरांत अगस्त - सितंबर में कंडाली या किर्जी उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है। इस दिन प्रत्येक परिवार प्रातः काल उठकर सर्वप्रथम जौ और फाफर के आटे से निर्मित "ढूंगो" देवता की अर्चना अपने

Bagwal – Devidhura Mela

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देवीधुरा मेला देवीधुरा उत्तराखंड में वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पत्थरों की वर्षा का एक विशाल मेला जुटता है। इस मेले को देवीधुरा मेला कहते हैं माँ बाराही धाम लोहाघाट-हल्द्वानी मार्ग पर लोहाघाट से लगभग 45 कि.मी की दूरी पर स्थित है। यह

Kainchi Dham – Maharajji Neem Karoli Baba

उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सुंदरता के लिए हमेशा ही विश्वविख्यात रहा है, जो एक बार उत्तराखंड का भ्रमण करता है वह बार बार यहां खिंचा चला आता है। यहाँ जगह जगह बने मंदिरों में अलौकिक शक्ति महसूस होती है, यहां सरोवर नगरी से आगे 22 किमी० और भवाली से 8 किमी०

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